ख़्वाब की ऐसी-तैसी


मेरा छोटा भाई सोनू कल मुझसे बार-बार मोहन के बारे में पूछ रहा था। वह जानना चाहता था कि हम दोनों दोस्तों की किश्तियाँ बिलकुल विपरीत क्यों चल रही हैं? मेरे यह बोलने पर कि वह भटक गया, अच्छा माहौल न मिला, सोनू बोलने लगा, ”यह तो कोई बात न हुई। कहानी में तो हमेशा कोई ख़ास बात होती है।” मेरे मन के भीतर भी एक कहानीकार बेचैन-सा करवटें ले रहा था। मेरे मानस-पटल पर मोहन की धुंधली खट्टी-मीठी स्मृतियाँ बिलकुल स्पष्ट नज़र आने लगी। सोचने लगा कि यदि सधी राह होती, सधा ख़्वाब होता, उफनती नदी-सा जज़्बात न होता तो आज शायद वह ज़िंदगी के इस मोड़ पर खड़ा न होता।
मोहन पहले ऐसा न था। बचपन में मुझे हमेशा यूँ ही लगता था कि उसका मन गंगा के ढाल-सा होगा। हमेशा साफ़, भरा और छलछलाता हुआ। चाहे कितना ही सूखा क्यों न आ जाए, पर मन में स्नेह का स्त्रोत हमेशा लबालब भरा हुआ रहेगा। लेकिन वक्त ने एक ऐसा गीत गाया कि वह अब गुनगुनाना भूल चुका है। आज उसके अंदर इतना टेढापन पैदा हो गया है कि उसकी नज़र में मोहब्बत मोहब्बत न रही, रिश्ते रिश्ते न रहे, जीवन जीवन न रहा। सबकुछ एक मज़ाक बनकर रह गया है। वह मनोविकारों का मानो एक गुलदस्ता बन गया है।
मुझमें और मोहन में सबसे बड़ा अंतर यह था कि मैं समय की दौड़ से कदम मिलाने में अपने ख़्वाब छोटे करता चला गया। मोहन मुझसे कहा करता, “तुम बहुत डरपोक हो जो तुमने अपने ख़्वाबों के अध-लिखे पन्ने फाड़कर फ्लश-आउट कर दिए। अरे भाई, कभी अपनी मन की बात सुनो, उसकी ताल-से-ताल मिलाओ, तो जीने का मज़ा कुछ और ही है।” लेकिन मैं उसकी बातों से सहमत न होता। शुरु से ही मैंने दिल की आवाज़ को इतना दबाया था कि वह तो कब का ख़ामोश हो गया था। मैं कहता, “यार, मैं नहीं जानता कि मैं सही हूँ या ग़लत। शायद जानना भी नहीं चाहता। मेरी ज़िंदगी का तो सीधा-सा फ़लसफ़ा है कि भॅवर से बचकर यदि कोई भटकती नाव किनारे पर लगी हो, तो उसे वही लगी रहनी देनी चाहिए। चमक-दमक के चकाचौंध में खुद को खो देना अच्छी बात नहीं है। हवा में ख़्वाबों के पंख लगाकर उड़ना ज़िन्दगी नहीं। ज़िन्दगी यथार्थ की माटी पर पनपती है, नए पौधे की तरह। गीली मिट्टी की तरह है वर्तमान। ख़्वाब देखने की बजाय अपना कर्म करो।” मोहन शिकायत करता, “यार, तुम भी न! एक बार बोलना शुरु करते हो तो बस नारियल की सूखी मूंज से जैसे गरम राख को जूठे पतीलों के काले तलों पर रगड़ते ही चले जाते हो।” मेरा चेहरा विहँस उठता।
हमारे बीच यह संवाद एक बार नहीं, बार-बार हुआ। लेकिन न वह बदला, न मैं। वह हक़ीक़त से दूर भागता रहा। ख़्वाब देखता रहा। हर मिट्टी के चंदन और हर बगिया के नंदन हो जाने का ख़्वाब। छलकती आँखों को वीणा थमाने का ख़्वाब, सिसकती साँसों को कोयल बनाने का ख़्वाब।
अंततः सारे ख़्वाब अविवाहित ही मर गये क्योंकि ख़्वाब देखने से हक़ीक़त बदलती नहीं, बस धुंधला जाती है और जब ख़्वाब के दरवाजे और खिड़कियाँ बंद करनी पड़ जाती है, तो बड़ा दुःख होता है। मिर्च से तेज़ लगता है जलेबी का चाँटा। जब बंद पड़े-पड़े ख़्वाबों में बड़े सोर पैदा हो जाते हैं, कुंठाऍ पनप जाती है तो जीना भी मुश्किल लगने लगता है। कई बार तो हक़ीक़त में मिल रहे दुःख जीवन की जिजीविषा से भी बड़े हो जाते हैं। हर राह, हर मोड़, हर घड़ी, हर पहर अजनबी बन जाते हैं। ज़िन्दगी एक सुलगता सफ़र बन जाती है।

नई उमर की चुनरी हो या कमरी फटी-पुरानी हो, मैं सबसे यही कहना चाहता हूँ कि यदि आपके मन की कुटिया में भी इठलाती हुई, बलखाती हुई, चुपचाप कहीं से कोई ख़्वाब आऍ तो उसमें खो न जाऍ क्योंकि आज नहीं तो कल, ये बादल बिखर जाएंगे।

मैं जानता हूँ कि सफ़र लंबा है और हक़ीक़त कड़वी है। ऐसे में कभी-कभी सच्चाईयों से नावाक़िफ़ रहना और बस परछाईयों से खुद को बहलाते रहने अच्छा लगता है। लेकिन हम अनजाने में चाँद की परछाईयों को पाने की तमन्ना में अपने अंदर की रौशनी के दीप बुझाते चले जाते हैं। ठीक उसी तरह जैसे अपने देश में कुछ अंग्रेजी पढे-लिखे लोग अपनी महान सांस्कृतिक विरासत को भुलाकर, अर्धनग्न रह कर, रिश्तों की अहमियत भुलाकर खुद को ज़्यादा आधुनिक, प्रगतिशील और सुसंस्कृत समझने लगते हैं। वे भूल जाते हैं कि दाँत जब अपनी जगह से हट जाता है, तब वह किसी काम का नहीं रहता। यदि आप मेरी बातों से सहमत नहीं हैं, तो एक बार खुद वर्तमान हालात पर गौर करें। जिस युवा पर जिम्मेदारी थी, देश को फर्श से उत्कर्ष तक पहुँचाने की, वे आज इस सामाजिक पारंपरिक परिवेश से ऊबकर क्यों बदकार बनकर भटक रहे हैं? संयुक्त परिवार क्यों लुप्त होते जा रहे हैं? आख़िर इतनी कुंठा का कारण क्या है? छायावादी प्रेम प्रगतिवाद की भट्टी से गुजरकर मांसलता के दौर में आ गया है। यह अच्छी बात है?

यार, समस्याओं की फ़ेहरिस्त बड़ी लंबी है। मैं पूछता हूँ अपने पददलित समाज से, मैं पूछता हूँ इस शोषित संस्कृति से कि क्या समाज के इसी नए अवतार की कल्पना और कामना हम करते हैं? मेरे रचनाकार के मन में जो बेचैनी पल रही थी, दिमाग पर जो दस्तकें लगातार पड़ रही थीं और जिरह जारी थी, उसमें अब आप सभी पाठको को सहभागी और सहयात्री बनाना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि इसे पढने के बाद आप स्वयं अपने मन में रचनागत हो।

एक हसीन ख़्वाब और ढेर सारे ख़्याल, उनसे जुड़ी हमारी आशा, न पूरी होने का डर। आख़िर क्यों हम बस इन्हीं बातों में फँसकर रह जाते हैं? यदि अभी भी आपको इस ‘क्यों’ का जवाब नहीं मिला है तो जी, दुनिया में ऐसे बहुत-से ‘क्यों’ हैं जिनका हमारे पास कोई जवाब नहीं है।

-साकेत बिहारी

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3 Comments Add yours

  1. बेहतरीन लेखनी💝

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  2. Saket Bihari says:

    धन्यवाद।😊

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